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सामूहिकता का भाव

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पं. दीनदयाल उपाध्याय

हम देश के वैभव की कामना लेकर चल रहे हैं। रोज अपनी प्रार्थना में भी हम भगवान् से ही आशीर्वाद मांगते हैं कि हमारा राष्ट्र वैभव के परम शिखर पर पहुंचे। वैभव की यह कामना अत्यंत ही स्वाभाविक है, जिसमें यह कामना नहीं, जिसमें यह इच्छा नहीं, उसे मानव कहना अनुपयुक्त होगा। प्रत्येक व्यक्ति ऊंचा उठना चाहता है, आगे बढ़ना चाहता है, सुखी बनना चाहता है। किंतु विचार का प्रश्न यही है कि यह सुख, यह वैभव, यह उत्कर्ष, इसका रूप क्या हो? हम ऊपर बढ़ रहे हैं, इसका मतलब क्या, तो बहुत बार तो लोग इतना ही मतलब समझते हैं कि व्यक्तिगत दृष्टि से हमारा मान-सम्मान बढ़ जाए, हम ऊंचे हो जाएं। हमें सुख के सभी साधन उपलब्ध हो जाएं और लोग उसके लिए प्रयत्न भी करते हैं, पढ़ाई-लिखाई बाकी के जीवन की दौड़-धूप-धंधा – यह सब इसी हिसाब से किया जाता है कि मैं व्यक्ति इस नाते से बड़े से बड़ा बन जाऊं। व्यक्तिगत आकांक्षा को लेकर लोग काम करते हैं।

परंतु जरा गहराई के साथ सोचें तो एक बात पता लगेगी कि यह व्यक्तिगत आकांक्षा जिस समाज में हम पैदा हुए हैं, जिस राष्ट्र के हम अंग हैं, उससे अलग हटकर के पूरी नहीं की जा सकती। अगर कुछ पूरा हो सकता है, अधूरा हो सकता है। अपनी किसी भावना को, आकांक्षा को, आत्मा को दबा के तो किया जा सकता है, किंतु सर्वोत्मुखी विकास, सभी पहलुओं से प्रगति यह अकेले-अकेले नहीं की जा सकती, क्योंकि व्यक्तिगत जीवन नाम की यह चीज़ वास्तव में कोई चीज है नहीं, यह तो शायद शरीर का बंधन है, जिसके कारण ऐसा पता लगता है कि मैं हूं, परंतु जब ‘मैं’ का हम लोग विचार करते हैं तो हममें से हरेक सोचेगा कि यह ‘मैं’ क्या है और उस ‘मैं’ का जब आप विश्लेषण करेंगे, उसका एनालिसिस करेंगे तो उस ‘मैं’ के अंदर हमें क्या दिखाई देगा? नाम मेरा लीजिए, दीनदयाल। इस दीनदयाल के नाम के साथ मेरा मैं जुड़ा हुआ है, इसके साथ बड़ा मोह भी है। हरेक का अपने नाम के साथ मोह होता है, इसी के द्वारा लोग मुझे पहचानते हैं। मुझे पुकारते हैं और उसका मेरा इतना संबंध हो गया है कि नींद में भी अगर कोई मेरा नाम लेकर पुकारे तो मैं एकदम जाग जाता हूं।

आप जानते हैं कि जब कोई आदमी सोता है तो बाक़ी की आवाज आप करते रहिए एकाएक आंख नहीं खुलती, इधर-उधर के नामों से पुकारते रहिए तो आंख नहीं खुलती। परंतु उसी व्यक्ति का नाम लेकर जब पुकारेंगे तो फिर उसकी नींद खुल जाती है। क्यों खुल जाती है? शोर से अगर नींद खुल जाती। कभी शोर से खुलती है और बहुत बार नहीं खुलती। बाक़ी इधर-उधर के पचास नाम पुकारें, नहीं खुलती और अपने ही नाम को पुकारा तो एकदम कैसे ध्यान आ जाता है। भीड़ में भी अगर कोई एकदम दूर से पुकारे ‘दीनदयाल’ तो एकदम लगता है कि कोई बुला रहा है। कौन बुला रहा है-आदमी चौंक जाता है, क्योंकि उसके नाम के साथ मैं जुड़ा है, परंतु जब गंभीरता के साथ पूछा जाए कि भई, दीनदयाल नाम आया कहां से, तो पता लगेगा कि इसकी जगह नाम जॉन क्यों नहीं हुआ, इसकी जगह कोई और नाम मोहम्मद बेग क्यों नहीं रखा गया। जिसके साथ मेरा इतना नाता हो गया, सबकुछ जुड़ गया। लोग कहेंगे कि माता-पिता ने रख दिया। माता-पिता ने भी यही नाम क्यों रखा, क्योंकि नाम मां ने रखा, उससे भी कोई बहुत बड़ा अर्थ तो नहीं। कोई भी नाम रखा जा सकता था, परंतु नहीं रखा, यही रखा। इसका मतलब है कि जिस समाज का मैं अंग हूं, उस समाज में यह नाम प्रचलित है। यह नाम समाज से प्राप्त हुआ है। यह नाम मेरा अपना नहीं है और इसलिए जिस समाज में जो जन्मता है, उसके हिसाब से उसे नाम प्राप्त हो जाता है।

वास्तविकता तो यह है कि समाज से हमारा संबंध नाम के साथ ही हो जाता है। यानी माता-पिता के साथ संबंध जन्म से, परंतु नाम का संबंध तो एकदम समाज के साथ जुड़ गया कि हां, आप इस समाज के हैं और फिर इतना ही नहीं उसके आगे और जुड़ता है, फिर आप बोलते हैं, अब जो भाषा मैं प्रयोग कर रहा हूं, यह भाषा तो मेरी नहीं, मुझे किसी ने दी है। अब लोग बोलते हैं कि मातृभाषा। अब ठीक है कि सबसे पहले मां ही भाषा सिखाती है। वैसे तो एक जगह किसी ने कहा कि भाई, लोग मातृभाषा ही क्यों कहते हैं। पितृभाषा क्यों नहीं कहते। आखिर मां-बाप दोनों घर में रहते हैं। तो किसी ने कहा कि भाई, यह कहते हैं कि बेचारे पिता को तो घर में बोलने का मौका ही नहीं मिलता, मां ही बोलती रहती है। इसके कारण उसकी मातृभाषा कहते हैं। किंतु बच्चों को बोलना सिखाना सबसे पहले मां ही सिखाती है। परंतु मां अकेली तो नहीं है और भी हैं, आस-पास के लोग हैं। घरवाले हैं, बाकी के लोग हैं, बहुत से शब्द समाज सिखाता है। तो यह भाषा समाज से आई। विचार करने की पद्धति समाज से आई, अच्छा-बुरा क्या है, यह सब समाज से आया, मेरे मन में किस चीज से समाधान होगा, संतोष होगा, यह भी समाज से आता है। आख़िर यह जो चीज़ है, समाज के चार लोग सुख-दुःख बांटते हैं, यह अकेला नहीं है। कोई कहे कि भाई अकेला होता है, तो, यह ग़लत है, अगर अकेले ही में सुख-दुःख हो जाए तो फिर यह जो शादी-विवाह में इतने लोग इकट्ठे किए जाते हैं, जरूरत ही नहीं। परंतु हम जानते हैं कि अपने घर का पैसा खर्च करके लोगों को इकट्ठा करते हैं, बुलाते हैं, खिलाते हैं और कोई नहीं आया, तो उलाहने देते हैं। अब किसी के यहां शादी हो, वह आपको निमंत्रण दे और आप न जाएं और जब वह मिले कहे कि देखो भाई, तुम आए नहीं उस समय तुम जवाब दोगे कि भाई, मैं इसलिए नहीं आया कि मैंने सोचा कि चला जाऊंगा तो तुम्हारा और कुछ न सही तो चार आने का खाकर जाऊंगा, इसलिए तुम्हारी बचत कर दी। ऐसा अगर आप उसको कहें तो उसको बुरा लगेगा। यानी वह बचत नहीं चाहता, बल्कि खर्च करना चाहता है। क्यों? इसलिए कि बिना चार लोग इकट्ठा किए उसका सुख वास्तव में सुख नहीं। सुख-दुःख का संबंध समाज के साथ आता है, समाज का एप्रिसिएशन समाज की सराहना, यह आदमी को सबसे बड़ी लगती है। लोगों का मान-सम्मान भी जो है, उसके लोग बड़े भूखे रहते हैं। अब आजकल क्या है— पद्मश्री, पद्मभूषण इसके भूखे, काहे के भूखे हैं? क्या है पद्मश्री? पद्मभूषण? इनमें न तो कहीं पद्म है, न श्री है। परंतु फिर भी लोगों को लगता है कि उसके पीछे समाज ने एक सम्मान दिया है, यह भावना छिपी है और इसलिए व्यक्ति समाज के सम्मान का ही भूखा रहता है।

समाज ने किसी को बुरा कहा तो बुरा लगता है। समाज ने किसी को अच्छा कहा, तो मन के अंदर अच्छा लगता है। अपना सुख-दुःख इस बात के ऊपर निर्भर करता है। नहीं तो जिसको कहते हैं कि जंगल में मोर नाचा किसने देखा। आदमी चाहता है कि मोर नाचे और लोग देखें और इस दिवानेपन की होड़ में ही सब बातें अच्छी बुरी, अनेक प्रकार की, आदमी कर जाता है। तो यह सब चीज यानी नाम की चीज़ नहीं, और फिर बाक़ी के किसी को आप जानते हैं कि बुरा-भला भी किसी को गाली दे दे। मुझे मालूम है, एक जगह ऐसा ही हुआ, गाड़ी का मुझे अनुभव है। गाड़ी में बातचीत हो रही थी और होते-होते दो लोगों के अंदर कुछ तू-तू मैं-मैं हो गई। अब तू-तू, मैं-मैं होती रही और कोई बात नहीं, और उसने फिर उसको दो-चार बुरी-भली भी बातें कहीं, इसने भी उसको जवाब दिया। इतना होते-होते और उसमें से एक ने न मालूम उसको क्या हुआ और जो दूसरे सज्जन थे, वह पंजाबी थे, तो इसलिए यह एकदम बिगड़ा और बोला कि यह सब पंजाबी ऐसे ही होते हैं, इनका न तो दिमाग होता है, न बाक़ी कुछ होता है और हर जगह लड़ने के लिए आमादा हुए रहते हैं। पंजाबी कहकर उसको तो मैंने देखा कि फिर जब तक तो उसको व्यक्तिगत रूप से भला-बुरा कहा, तब तक थोड़ा-बहुत तू-तू, मैं-मैं चल रही थी, पर जैसे ही पंजाबी कहा तो उसको एकदम जोश आ गया और बोला, अच्छा और फिर कहा कि देखो भाई सबकुछ तो ठीक है, अब तक तुमने मुझे गाली दी थी तो सह लिया किंतु तुम तो हमारे सब पंजाबियों को गाली दे रहे हो, यह सहन नहीं होगा। भाई, यह जो बात आ गई है, इसका मतलब यह है कि उसके अंदर कहीं वह चीज है। अगर वह नहीं होती, तो उसको क्या था और इतना नहीं तो और आगे जाकर देखें। अब अगर कोई आज रामचंद्रजी को बुरा-भला कहने लगे, छत्रपति शिवाजी महाराज को बुरा-भला कह दे, भगवान् कृष्ण को कह दे, तब आपका खून भड़केगा कि नहीं? अगर भड़केगा तो क्यों भड़केगा? अगर आपका जितना ‘मैं’ है, उस ‘मैं’ का संबंध वह जो शरीर है, उतने तक ही रहता तो क्या? कहीं आपके अंदर रामचंद्रजी बैठे हैं क्या? परंतु लगता है, कहीं-न-कहीं बैठे हैं और इसलिए बुरा लगता है, नहीं तो बुरा लगने का कारण नहीं।

अगर बिल्कुल ही भौतिक दृष्टि से देखें तो यही लगना नहीं चाहिए, परंतु ऐसा लगता है कि कहीं मेरे अंदर रामचंद्रजी हैं। मेरे अंदर श्रीकृष्ण हैं। मेरे अंदर मेरे पूर्वज यानी जो शायद मेरे माता-पिता मर गए, वह भी मेरे अंदर बैठे हैं। कहीं-न-कहीं मेरे अंदर जिसको मेरा मन, मेरा मस्तिष्क, मेरी बुद्धि, मेरी भावना, इनके वह अंग बनकर के बैठे हैं और फिर उसके साथ मेरा देश बैठा है, यानी अगर इसका विश्लेषण करें तो फिर यही पता लगेगा कि फिर ‘मैं’ नाम की चीज़, यह तो केवल एक शाब्दिक प्रयोग हो गया है। वास्तविकता यह है कि हम हैं, यही महत्त्व की चीज है। हम हैं इसलिए हमारा सबका सुख है, सामूहिक सुख है और दुःख यह भी सामूहिक। वैभव सामूहिक है और इसलिए हम लोगों ने भगवान् से यही प्रार्थना की है कि हे भगवान् हमारे राष्ट्र को और वैभवशाली बनाओ।

शेष अगले अंक में…
-शीत शिविर, बौद्धिक वर्ग : बरेली, 4 फरवरी, 1968

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